ついに決着!「きのこの山 vs たけのこの里」論争

 

 

団欒の場において、不適切な話題がある。

政治、宗教、民族、収入、女性の年齢や体重、ブログのアクセス数など。

最たる例は、「きのこの山とたけのこの里、どつちがすき?」だ。

 

松本ひで吉『さばげぶっ!』19話(講談社コミックスなかよし)で、不毛な論争をおう。

主人公「園川モモカ」が火つけ役。

 

 

 

 

爆弾発言にこおりつく部員たち。

 

政治学者サミュエル・ハンチントンいうところの、「文明の衝突」

現代は、政治思想でなくお菓子が、対立軸となる。

 

 

 

 

本稿は中立的観点から書くつもりなので、

公平を期すためのべておくと、筆者はきのこ派。

 

いまさら、この国民食の魅力をかたり、屋上屋を架すまねはしない。

唯一の缺点を指摘しておく。

クラッカー部分がおれやすく、箱をあけてかなしくなること。

だがこれは「もちやすさ」という美質で、十分すぎるほど相殺。

単なるお菓子の範疇をこえ、神の意志を体現した、畏怖すべき奇跡だ。

 

 

 

 

腹黒いモモカは空気をよみ、主張をひつこめるが、「鳳部長」がニトログリセリンをそそぐ。

身の程しらない下衆どもめ!

 

 

 

 

みるだけで目が穢れ、嘔吐をもよおす。

駄菓子とよぶのもおこがましい、ゴミ的な物質。

クッキー部分のモサモサ感など、缺点をあげだすとキリがなく、

サーバの容量制限をこえてしまうため、ひとつだけ。

 

「里」つてなんだよ。

たけのこ派同士で、わざわざ村落を形成すんのか。

都会人が賞味することを前提としない、過疎地域むけの商品だ。

 

 

 

 

宗教戦争勃発!!

 

クラウゼヴィッツいうところの、「殲滅戦理論」

明治一社に、チョコスナックふたつは多すぎ。

敵を撲滅し、後顧の憂いをたたねば、いきのこれない。

 

 

 

 

「たけのこ討つべし…」

やる気ゼロの幽霊部員「豪徳寺かよ」たんが、はじめてサバゲに参加。

 

人を幸福にするはずのお菓子が、はてなき憎悪と流血をもたらす。

 

 

 

 

なんとそこへ、ロッテが電撃的に参戦!

 

 

 

 

ビスケットのサクサク感と、チョコのまろやかさのマリアージュ。

なにより愛くるしい外見と、たのしいヴァリアシオン。

うん……ああ……やつぱコアラかな……。

 

ここに、四半世紀におよぶ激戦が終結。




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苑田 謙

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